करियर

अहसास समेटे, इतिहास सहेजे कारमाइकल लाइब्रेरी

Carmichael Library captures feelings and preserves history

वाराणसी।

कारमाइकल लाइब्रेरी न केवल 19वीं सदी में बनारस की बौद्धिक गतिविधियों का केंद्र रही, बल्कि 20वीं सदी में यह क्रांतिकारियों की विचार–भूमि और मिलन स्थल के रूप में भी प्रसिद्ध हुई। बनारस के पहले सार्वजनिक पुस्तकालय के रूप में पहचान बनाने वाली यह लाइब्रेरी अपने भीतर ज्ञान, संघर्ष और इतिहास के अनगिनत अध्याय समेटे हुए है।

चौक–गोदौलिया मार्ग पर ज्ञानवापी के समीप वर्ष 2019 तक एक बहुमंजिला भवन स्थित था। इसके भूतल पर चारों ओर दुकानें थीं, जबकि ऊपरी तल पर कपड़े का शोरूम और निशुल्क वाचनालय संचालित होता था। यही वाचनालय आगे चलकर कारमाइकल लाइब्रेरी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। श्रीकाशी विश्वनाथ धाम विस्तारीकरण परियोजना के तहत इस ऐतिहासिक भवन ने विस्थापन स्वीकार किया।

स्थापना और नामकरण की कहानी

बताया जाता है कि कारमाइकल लाइब्रेरी की स्थापना वर्ष 1872 में राय संकटाप्रसाद खत्री ने एक कक्ष में की थी। उस समय इसे ‘सिटी लाइब्रेरी’ कहा जाता था। इसके संचालन के लिए 23 सदस्यीय कार्य समिति बनाई गई और आय के लिए दुकानों को किराये पर देने की व्यवस्था की गई।

1874 में विजयनगरम महाराज के आर्थिक सहयोग से और काशीनरेश द्वारा ज्ञानवापी के पास प्रदत्त भूमि पर भवन का निर्माण हुआ। शिलान्यास महाराज ईश्वरीनारायण सिंह ने किया। उस समय बनारस के पुलिस कमिश्नर सी.पी. कारमाइकल थे, जिन्हें अध्ययन और लेखन में गहरी रुचि थी। उनके प्रयास से 1875–76 में म्यूनिसिपैलिटी से आर्थिक सहायता मिली और 1876 में लाइब्रेरी का नाम ‘कारमाइकल लाइब्रेरी’ रख दिया गया।

1889 में इसे सोसायटी एक्ट के तहत पंजीकृत कराया गया, जो उस समय एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी।

विद्वानों और साहित्यकारों का केंद्र

समय के साथ कारमाइकल लाइब्रेरी दुर्लभ पुस्तकों और ग्रंथों से समृद्ध होती गई। गाजा शिवप्रसाद ‘सितारे हिंद’ इसके पहले अध्यक्ष बने, जबकि जानकी प्रसाद मेहता लाइब्रेरियन नियुक्त हुए।

मुंशी प्रेमचंद, भारतेंदु हरिश्चंद्र, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे महान साहित्यकारों और विद्वानों का यहां आना–जाना रहा। डॉ. संपूर्णानंद का इससे विशेष जुड़ाव था और पूर्व मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी करीब तीन दशक तक इसके अध्यक्ष रहे।

क्रांतिकारियों की पाठशाला

कारमाइकल लाइब्रेरी काशी के आरंभिक क्रांतिकारियों की भी प्रमुख मिलन स्थली रही। चंद्रशेखर आजाद जब काशी आए तो लक्ष्मीनारायण शर्मा के साथ भटवाली गली में रहते थे। असहयोग आंदोलन के दौरान वे नियमित रूप से कारमाइकल लाइब्रेरी के वाचनालय में अखबार और पुस्तकें पढ़ने आते थे। माना जाता है कि यहीं के अध्ययन से उनके भीतर राजनीतिक चेतना और वैचारिक दृढ़ता विकसित हुई।

विस्थापन और नया ठिकाना

1992 में अयोध्या घटनाक्रम के बाद ज्ञानवापी की सुरक्षा में सीआरपीएफ तैनात की गई। निगरानी के लिए कारमाइकल लाइब्रेरी की ऊपरी मंजिल का उपयोग हुआ, जिसे हटाने के लिए लाइब्रेरी प्रबंधन ने सुप्रीम कोर्ट तक गुहार लगाई। अंततः किराये के रूप में 16 लाख रुपये का भुगतान कराया गया।

श्रीकाशी विश्वनाथ धाम परियोजना के तहत 2019 में ज्ञानवापी क्षेत्र से विस्थापित होने के बाद कारमाइकल लाइब्रेरी को मकबूल आलम रोड पर जिला जेल के सामने स्थित दो मंजिला भवन में स्थानांतरित किया गया। यहां वाचनालय को नए सिरे से व्यवस्थित किया गया और दुर्लभ पुस्तकों का संरक्षण किया गया।

समृद्ध पुस्तक संपदा

उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार 1934 में लाइब्रेरी में करीब 18 हजार पुस्तकें थीं, जो 1965 तक बढ़कर 30,500 हो गईं। इनमें 17 हजार अंग्रेजी, 5 हजार हिंदी, 1 हजार संस्कृत, उर्दू, बंगाली और अन्य भाषाओं की सैकड़ों पुस्तकें शामिल थीं। वर्तमान में भी लगभग 35 हजार से अधिक पुस्तकें सुरक्षित मानी जाती हैं।

इतिहास का जीवंत साक्ष्य

दैनिक जागरण वाराणसी के मुख्य संवाददाता प्रमोद यादव के अनुसार, कारमाइकल लाइब्रेरी ने बनारस के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक इतिहास को नजदीक से देखा है। आज भी यह लाइब्रेरी अहसास समेटे और इतिहास सहेजे हुए नई पीढ़ी को ज्ञान की रोशनी दे रही है।

कारमाइकल लाइब्रेरी केवल एक भवन नहीं, बल्कि बनारस की बौद्धिक चेतना, क्रांतिकारी सोच और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है।

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