अनुदेशकों की ऐतिहासिक जीत: सुप्रीम कोर्ट ने माना नियमित, 17,000 मानदेय का आदेश
10 वर्षों से कार्यरत अनुदेशकों को ‘डीम्ड परमानेंट’ का दर्जा, 2017 से बकाया भुगतान के निर्देश
रिपोर्ट: गणपत राय
चंदौली। उत्तर प्रदेश के परिषदीय उच्च प्राथमिक विद्यालयों में कार्यरत हजारों अनुदेशकों के लिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला मील का पत्थर साबित हुआ है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अनुदेशकों को ‘डीम्ड परमानेंट’ (नियमित) कर्मचारी मानते हुए उनका मानदेय ₹17,000 प्रतिमाह करने का आदेश दिया है। इस निर्णय से वाराणसी सहित पूरे प्रदेश के अनुदेशकों में खुशी की लहर दौड़ गई है।

सुप्रीम कोर्ट की डबल बेंच—जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले—ने राज्य सरकार की दलीलों को खारिज करते हुए स्पष्ट कहा कि पिछले 10 वर्षों से लगातार सेवा दे रहे अनुदेशकों को केवल संविदाकर्मी नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि जिन कर्मचारियों को अनुबंध की शर्तों के तहत कहीं और कार्य करने की अनुमति नहीं है, उनके पद स्वतः सृजित माने जाएंगे।
कोर्ट ने 2013 से दिए जा रहे ₹7,000 के मानदेय को ‘अनुचित श्रम व्यवहार’ करार देते हुए इसे संविधान के अनुच्छेद 23 का उल्लंघन बताया। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा—“जब पढ़ेगा इंडिया, तभी बढ़ेगा इंडिया। ऐसे में मानदेय देने में क्या दिक्कत है?”
अदालत द्वारा जारी समय-सारणी के अनुसार, ₹17,000 प्रतिमाह का संशोधित मानदेय 2017-18 से प्रभावी माना जाएगा। 1 अप्रैल 2026 से नियमित भुगतान शुरू होगा, जबकि 2017 से अब तक का संपूर्ण बकाया आज से छह माह के भीतर अनिवार्य रूप से चुकाना होगा।
वाराणसी मंडल अध्यक्ष विकास यादव ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि अब अनुदेशकों की सेवाएं संविदा अवधि समाप्त होने के आधार पर खत्म नहीं की जा सकेंगी। वहीं जिलाध्यक्ष अभिनव सिंह ने इसे विधिक सलाहकार बृजेश त्रिपाठी और वरिष्ठ अधिवक्ताओं की कड़ी मेहनत का परिणाम बताया।
यह विवाद वर्ष 2017 में तब शुरू हुआ था, जब मानदेय ₹8,470 से बढ़ाकर ₹17,000 किया गया, लेकिन सरकार बदलने के बाद इसे लागू नहीं किया गया। लखनऊ हाईकोर्ट की सिंगल बेंच के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने अब अनुदेशकों के पक्ष में अंतिम मुहर लगा दी है।



